जन्म जन्म के चक्कर खा कर हीरा जीवन मिलता है -Lyrics/लिखित भजन। पथिक भजन।आर्य समाज वैदिक भजन

जन्म जन्म के चक्कर खा कर हीरा जीवन मिलता है -Lyrics/लिखित भजन। पथिक भजन।आर्य समाज वैदिक भजन

तर्ज़ - नमस्कार भगवान् तुम्हें ।

 जन्म जन्म के चक्कर खा कर हीरा जीवन मिलता है ।

शुभ कर्मों के फल स्वरूप यह फूल चमन में खिलता है । 
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . 

अजर अजन्मा अमर जीव का नर तन उत्तम चोला है ।
 उपलब्धि का आज तलक नहीं भेद किसी ने खोला है । 
  न तो कहीं यह मोल बिके और न दरज़ी से सिलता है । । 
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . . २ 

सृष्टि के अनमोल पदार्थ जो भगवान् बनाता है ।
   वही कुशल कारीगर ही इस चोले का निर्माता है ।      
 जिस की मर्जी बिना जगत् में पत्ता तक नहीं हिलता है ।
 शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . . ३ 

कुन्दन बनता है सोना जब इसको आग तपाती है ।
 छेनी से छिल कर हीरे की चमक और बढ़ जाती है । ।
 प्रभु मिले तो हँस कर झेलो जितना संकट झिलता है । 
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . . ४

 सदा जवानी नहीं रहेगी ले शुभ कर्म कमा प्यारे ।
 तन के पुर्जे ढीले होंगे समय न व्यर्थ गँवा प्यारे ।
 ' पथिक ' आख़री पहर में जीवन ठेले से नहीं मिलता है ।
 शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . . ५

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